Environmental revolution

लेखक-राकेश मिश्रा (फाउंडर ऑफ नया सवेरा संस्था)

आजकल विश्व भर में पर्यावरण और इसके संतुलन की बहुत चर्चा है।
क्योंकि वर्तमान में पर्यावरण विघटन की समस्याओं ने ऐसा विकराल रूप धारण कर लिया है कि पृथ्वी पर प्राणी मात्र के अस्तित्व को लेकर भय मिश्रित आशंकाएं पैदा होने लगी हैं। जनसंख्या वृद्धि के साथ ही नई कृषि तकनीक एवं औद्योगिकरण के कारण लोगों के जीवन स्तर में बदलाव आया।मनुष्य के दैनिक जीवन की आवश्यकताएँ बढ़ गई,इनकी पूर्ति के लिए साधन जुटाएँ जाने लगे।विकास की गति तीव्र हो गई और इसका पैमाना बढ़ता गया।अधिकाधिक प्राकृतिक संसाधनों का दोहन,इसने एक नई औद्योगिक संस्कृति को जन्म दिया।प्रकृति के साथ अनेक वषों से की जा रही छेड़छाड़ से पर्यावरण को हो रहे नुकसान को देखने के लिए अब दूर जाने की जरूरत नहीं है। विश्व में बढ़ते बंजर इलाके,फैलते रेगिस्तान,कटते जंगल,लुप्त होते पेड़-पौधे और जीव जंतु,प्रदूषणों से दूषित पानी,कस्बों एवं शहरों पर गहराती गंदी हवा और हर वर्ष बढ़ते बाढ़ एवं सूखे के प्रकोप इस बात के साक्षी हैं कि हमने अपनी धरती और अपने पर्यावरण की ठीक-देखभाल ठीक ढंग से नहीं की।अब इसके होने वाले संकटों का प्रभाव बिना किसी भेदभाव के सम्पूर्ण विश्व,वनस्पति जगत और प्राणी मात्र पर समान रूप से पड़ रहा है।आज पूरे विश्व में लोग अधिक सुखमय जीवन की परिकल्पना करते हैं।

नदियों की हालत खराब
हमारे जीवन के तीनों बुनियादी आधार हवा,पानी और मिट्टी आज खतरे में हैं।सभ्यता के विकास के शिखर पर बैठे मानव के जीवन में इन तीनों प्रकृति उपहारों का संकट बढ़ता जा रहा है।हमारे लिए हवा के बाद जरूरी है जल।इन दिनों जलसंकट बहुआयामी है,इसके साथ ही इसकी शुद्धता और उपलब्धता दोनों ही बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि हमारे देश में सतह के जल का 80 प्रतिशत हिस्सा बुरी तरह से प्रदूषित है और भू-जल का स्तर निरंतर नीचे जा रहा है।शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने हमारी बारहमासी नदियों के जीवन में जहर घोल दिया है,हालत यह हो गए हैं कि मुक्तिदायिनी गंगा की मुक्ति के लिए अभियान चलाना पड़ रहा है।गंगा ही क्यों किसी भी नदी की हालत ठीक नहीं कही जा सकती है।
जीव-जंतु विलुप्ति की कगार पर
बिना पर्यावरण संरक्षण के आज स्थिति यह है कि जंगलों की कटाई हो जाने के कारण वर्षा की स्थिति अनिश्चित हो गई है।कहीं बाढ़ आ रही है और दूसरी तरफ सूखा पड़ रहा है।वर्ष में कभी भी बरसात होने लगती है।कई जीव-जंतु विलुप्ति की कगार पर हैं।हाथी,बंदर इत्यादि जंगली जानवर अक्सर गांवों,शहरों में चले आते हैं,क्योंकि जंगली जानवरों का बसेरा ‘जंगल’ अब उन्हें कम पड़ने लगा है।

ओजोन परत को क्षतिग्रस्त होने से पूरी दुनिया में कल-कारखानों का ऐसा जाल बिछा हुआ है कि उनसे निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों जैसे- कार्बन मोनो ऑक्साइड,कार्बनडाइऑक्साइड,मीथेन इत्यादि ने न केवल गांवों,शहरों के वातावरण को प्रदूषित कर दिया है,वरन् अब तो आसमान में ओजोन परत को भी क्षतिग्रस्त कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप एक तरफ तो सूरज की अल्ट्रा वायलेट किरणों का खतरा बढ़ गया है, दूसरी तरफ ग्लोबल वार्मिंग होने से ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघलने का अंदेशा हो गया है।हो सकता है किसी दिन ध्रुवों की सारी बर्फ पिघल जाए और समुद्र तल इतना ऊंचा हो जाए कि पूरी धरती समुद्र में समा जाए।

जीव-जंतुओं का जीवन खतरे में
प्राकृतिक जल-धाराओं को मानव जाति ने तरह-तरह के ठोस अपशिष्टों,रसायनों आदि से इतना प्रदूषित कर दिया है कि प्राकृतिक जल किसी उपयोग के लायक नहीं रह गया है।जल प्रदूषण के कारण जलीय वनस्पति एवं जीव-जंतुओं का जीवन खतरे में पड़ गया है।जहाँ एक ओर प्राकृतिक जलधाराओं (नदियों)ने मानव सभ्यताओं को उसके किनारे बसने के लिए प्रेरित किया था।अब स्थिति यह है कि नदियों के प्रदूषित पानी ने नदियों को गंदे नालों का रूप दे दिया है,जिनमें साल में केवल कुछ महीने पानी रहता है,शेष वर्ष में केवल गंदगी बहती है और गंदगी,बदबू किनारे के निवासियों का जीवन दुष्कर किए हुए हैं।मानवीय क्रियाकलापों ने धरती को भी (शहरों को भी) प्रदूषण मुक्त नहीं छोड़ा है।

पॉलीथीन का अंधाधुंध प्रयोग
आज गावों,शहरों में जहाँ देखो, वहाँ गंदगी फैली रहती है,ठोस अवशिष्टों का सही तरीके से निदान नहीं किया जाता है। खासकर पॉलीथिन का अत्यधिक उपयोग हो रहा है और कचरे के रूप में निकलने वाले प्लास्टिक,पॉलीथिन नष्ट नहीं होती और वातावरण को प्रदूषित करती है।कई दफा कल-कारखानों (जैसे-पेपर इंडस्ट्री, शुगर इंडस्ट्री,डिस्टीलरी)से निकलने वाले रसायनों को आस-पास की जमीन पर ही फैला दिया जाता है,जिससे इन कारखानों के आस-पास इतनी बदबू आने लगती है कि कोई प्राणी वहां गुजर- बसर नहीं कर सकता।

वेस्ट ट्रीटमेंट पर खर्चा नहीं
कल-कारखानों से निकलने वाले ठोस,द्रव एवं गैस अवशिष्ट को पहले कारखाने में शुद्ध करने का नियम है,तभी उन्हें वातावरण में या नदी-नालों में मिलाया जाना चाहिए!
हकीकत यह है कि कारखानों के मालिक वेस्ट ट्रीटमेंट पर खर्च नहीं करना चाहते।इससे कारखाने के आस-पास का वातावरण के कचरे से प्रदूषित होता रहा है।इस प्रकार वेस्ट ट्रीटमेंट के लिए बने नियम को निष्प्रभावी होते देखा जा सकता है।उपरोक्त दो उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि कैसे प्रदूषण नियंत्रण एवं पर्यावरण संरक्षण के उपाय होते हुए भी उनके परिणाम देखने को नहीं मिलते।इंसानों की लापरवाही और लालच छोड़ना होगा,नहीं तो सर्वनाश सुनिश्चित है।

वाहनों की संख्या हो सीमित
व्यक्तिगत तौर पर हर व्यक्ति को इस दिशा में ईमानदार प्रयास करना होगा तो ही पर्यावरण संरक्षण हो पाएगा।आज हर व्यक्ति को अपना-अपना वाहन चाहिए,जिनकी वाहन चलाने की उम्र नहीं है,उन्हें भी वाहन चाहिए।स्त्री,पुरुष,बच्चे,वृद्ध सभी को अलग वाहन चाहिए। दस कदम जाना हो तो भी वाहन चाहिए।वाहनों की ऐसी चाहत से पूरा वातावरण वाहनों के धुएं से ऐसा प्रदूषित है कि घर से बाहर निकलने को जी नहीं करता।इस समस्या का समाधान तभी संभव है,जब हर व्यक्ति कुछ त्याग करने को तैयार हो।हर घर में यथासंभव वाहनों की संख्या सीमित हो।जब तक आवश्यक न हो वाहन का उपयोग न किया जाए।वाहनों का रख-रखाव ऐसा हो कि कम-से-कम प्रदूषण फैले।
*खतरनाक रसायनों की मात्रा अधिक….*
आज खेती किसानी में रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग हो रहा है,जिससे पूरी कृषि भूमि प्रदूषित हो गई है और सिंचाई के पानी द्वारा ये सारे रसायन खेतों से होते हुए नदी-नालों एवं भूमिगत जल स्रोतों में मिल रहे हैं।रसायनों के उपयोग के कारण सारे कृषि उत्पाद,डेयरी उत्पाद प्रदूषित हो चुके हैं।इन प्रदूषित उत्पादों के उपयोग के कारण मानव शरीर में खतरनाक रसायनों की मात्र खतरे की सीमा तक पहुँच रही है।

*इलेक्ट्रॉनिक कचरा हो सकता है खतरनाक………*

इस ‘लेटेस्ट’ के चक्कर में आज विश्व में इतना ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक कचरा जमा होता जा रहा है,जिसका प्रबंधन असंभव-सा लगने लगा है।एक जमाना था जब लोग अपनी पुरानी वस्तुओं को सहेजकर रखते थे और सगर्व सभी को दिखाते थे और प्रशंसा पाते थे। आज जमाना उलटा है,जहाँ “ओल्ड इज नो गोल्ड एंड लेटेस्ट इज फिटेस्ट’’ है।पुरानी वस्तु जब तक उपयोगी हो उसका उपयोग करें तो काफी कुछ इलेट्रॉनिक कचरे से मुक्ति मिल सकती है।

*प्रदूषण परियोजना के कार्य पर विचार-विमर्श करना जरुरी….*
पृथ्वी पर सभी जगह प्रदूषण का प्रभाव पड़ चुका है और अब हमें पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण मुक्ति की किसी परियोजना पर कार्यकरना ही होगा।चूंकि पर्यावरण को प्रदूषित मानवों ने ही किया है,अत: इस परियोजना की शुरुआत मानवों की सोच एवं क्रियाकलापों में सुधार लाने से करनी हगी।इस दिशा में ‘पृथ्वी सम्मेलन ’ विश्व स्तर पर आयोजित किए जा रहे हैं,जिनमें यही विचार-विमर्श होता है कि धरती को कैसे बचाया जाए, परंतु अफसोस की बात है कि इन सम्मेलनों में आम सहमति नहीं बन पाती है।

*मीडिया की भूमिका अहम….*
आज दुनियाभर में अनेक स्तरों पर यह कोशिश हो रही है कि आम आदमी को इस चुनौती के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराया जाए,ताकि उसके अस्तित्व को संकट में डालने वाले तथ्यों की उसे समय रहते जानकारी हो जाए और स्थिति को सुधारने के उपाय भी गंभीरता से किए जा सके।भारत के संदर्भ में यह सुखद बात है कि पर्यावरण के प्रति सामाजिक चेतना का संदेश हमारे धर्मग्रंथों और नीतिशतकों में प्राचीनकाल से रहा है।हमारे यहाँ जड़ में, चेतन में सभी के प्रति समानता और प्रकृति के प्रति समान का भाव सामाजिक संस्कारों का आधार बिंदु रहा है। प्राकृतिक तथा मानवीय संसाधनों के युक्तियुक्त उपयोग द्वारा ही पर्यावरण की रक्षा की जा सकती है। इसमें लोक चेतना में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है।

*प्रकृति मित्र जीवनशैली से होगा पर्यावरण संरक्षण…..*
प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण भारतीय जीवनशैली का शुरू से ही एक हिस्सा रहा है।दैनिक जीवन में हम पेड़-पौधों के प्रति आदर रखते हैं,क्योंकि हमें पता है कि मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक पेड़ की भूमिका लेने की बजाय देते रहने की होती है। इसके बावजूद वनों का ह्रास हो रहा है।प्रदूषण बढ़ रहा है। जलवायु में लगातार परिवर्तन देखने को मिल रहा है।विश्व के कई देशों में आपदाएं देखने को मिल रही हैं।इस बदलाव की वजह कई हैं।प्राकृतिक और मानवजनित।मनुष्य मानव जनित आपदाओं को कम करने के उपाय कर सकता है। वैज्ञानिकों ने इस अवधारणा पर बल दिया कि ‘‘सतत विकास, विकास की वह प्रक्रिया है, जिसमें वर्तमान पीढ़ी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति को बिना नुकसान पहुँचाएँ करती है।’’ अर्थात् पर्यावरण को संरक्षित रखते हुए जो विकास किया जाए,वही सतत विकास है।अत: हमें ‘आवश्यकता की अवधारणा’ और ‘विचारों की सीमाओं’ को ध्यान में रखकर ऐसी नीति अपनानी होगी,जिससे कि वर्तमान और भावी दोनों पीढ़ियों की अवश्यकताएं पूरी हो सकें।पूर्व में औद्योगिक या अन्य परियोजनाओं की मंजूरी के समय उस परियोजना से मनुष्य, जीव,जंतु तथा आसपास के वातावरण पर या प्रभाव पड़ेंगे, इसका ध्यान नहीं रखा जाता था।

*इन उपायों से करें पर्यावरण संरक्षण…..*
• कम दूरी तय करने के लिए पैदल चलें या साईकिल का प्रयोग करें।कार पूल करें या सार्वजनिक वाहन प्रणाली का प्रयोग करें।
• अपने घर,फ्लेट या सोसाइटी में हर साल एक पौधा अवश्य लगाएं और उसकी देखभाल करके उसे एक पूर्ण वृक्ष बनाएं ताकि वह विषैली गैसों को सोखने में मदद कर सके।
• अपने भवन में चाहे व्यक्तिगत हो या सरकारी कार्यालय हो, वर्षा जल संचयन प्रणाली तकनीक प्रयोग में लाएं।
• बिजली के उपकरण जैसे पंखा, ट्यूब लाइट,कूलर,ए.सी., कंप्यूटर आदि को उपयोग के तुरंत बाद स्विच ऑफ़ कर दें।
• वायुमंडल में कार्बन की मात्रा कम करने के लिए सोलर पावर तथा स्वच्छ ईंधन का प्रयोग करें।
• पानी का प्रयोग करने के बाद नल को तुरंत बंद कर दें।कपड़े धोने के बाद साबुन वाले पानी से फर्श की सफाई करें और रिसाइकल,रियूज़ और रिड्यूस का हमेशा ध्यान रखें।
• डिस्पोज़ेबल वस्तुओं जैसे प्लास्टिक गिलास,पानी की छोटी-छोटी बोतल और प्लेट के प्रयोग से परहेज़ करें।
• फसलों के अवशेष न जलाएं। इससे पृथ्वी के अंदर रहने वाले जीव मर जाते हैं और वायु प्रदूषण स्तर में वृद्धि होती है।
• हर घर में यदि रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम लग जाए,तो पानी की वर्ष भर कमी न हो।
• हर व्यक्ति को चाहिए कि सोलर एनर्जी का जहां तक संभव हो उपयोग करे,क्योंकि बिजली पैदा करने में भी बहुत पर्यावरण का नुकसान होता है।
• आज आवास एवं व्यवसाय के लिए मल्टी स्टोरी बनाने का चलन है,जो कि बहुत उपयोगी है।मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में कम जगह में ज्यादा का काम चलता है,जो कि पर्यावरण के लिए अच्छी बात है।आज जरूरत इस बात की है कि संसाधनों,चाहे वह जमीन हो,पानी हो का उचित तरीके से उपयोग हो।
रि-साइक्लिंग की आज महती आवश्यकता है।जिस भी चीज की (पॉलीथिन की,पानी की इलेक्ट्रॉनिक सामान की इत्यादि) रि-साइक्लिंग संभव हो की जानी चाहिए,इसमें काफी कुछ प्रदूषण नियंत्रण होगा।
• पर्यावरण संरक्षण की परियोजना के उपरोक्त समस्त उपायों का बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक एवं पेपर,दोनों मीडिया द्वारा प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए,ताकि जब समाज के सामने बार-बार उपायों की जानकारी दी जाएगी, तब समाज में इन उपायों को अपनाना शुरू किया जाना शुरू होगा।

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